जानिए कैसे काम करता है अखबारों का राशिफल जाल

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प्रातःकाल की चाय की चुस्की के साथ जब समाचार पत्र हाथ में आता है, तो एक बड़ा वर्ग देश-दुनिया की उथल-पुथल से पहले जिस पन्ने पर नज़रें टिकाता है, वह है—’दैनिक राशिफल’। आज के वैज्ञानिक, तकनीकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में 12 राशियों के छोटे-छोटे खानों में सिमटी भविष्यवाणियाँ करोड़ों पाठकों की धड़कनें बढ़ाती या घटाती हैं। यह जिज्ञासा सहज ही यह सवाल उठाती है कि क्या यह केवल ज्योतिष का कोई चमत्कार है या फिर संभावनाओं (Probability), सांख्यिकी (Statistics) और मानव मनोविज्ञान का एक बेहद चतुर खेल? यदि गणित और तर्क के चश्मे से देखें, तो राशिफल का सच होना कोई दैवीय घटना नहीं, बल्कि सांख्यिकी का साधारण सा नियम है। लगभग 8 अरब की वैश्विक आबादी को 12 राशियों में बाँटने पर एक-एक राशि के हिस्से में करीब 65 से 70 करोड़ लोग आते हैं। अब यदि किसी राशि में लिखा हो कि “आज अचानक धन लाभ होगा” या “किसी पुराने मित्र से मुलाकात होगी”, तो 70 करोड़ की विशाल आबादी में से कम से कम कुछ लाख लोगों के साथ ऐसा घटित होना पूरी तरह स्वाभाविक है। इसे विज्ञान की भाषा में ‘कंफर्मेशन बायस’ कहते हैं—जिन कुछ लाख लोगों के साथ भविष्यवाणी सच बैठती है, वे उसे अखबार का चमत्कार मान लेते हैं, जबकि बाकी के करोड़ों लोग गलत साबित हुई बात को भूल जाते हैं।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह आकर्षण ‘बार्नम प्रभाव’ (Barnum Effect) पर आधारित है, जहाँ बेहद सामान्य, अस्पष्ट और सार्वभौमिक वाक्यों को व्यक्ति विशेष रूप से अपने लिए लिखा हुआ मान बैठता है। “आज कार्यस्थल पर तनाव रह सकता है” या “व्यर्थ के खर्चों से बचें” जैसी बातें इतनी व्यापक हैं कि किसी भी वयस्क के जीवन पर सटीक बैठ सकती हैं। इतना ही नहीं, यह कई बार ‘सेल्फ-फुलफिलिंग प्रोफेसी’ की तरह काम करता है, जहाँ अखबार में अप्रिय घटना का पूर्वाभास पढ़कर पाठक सुबह से ही आशंकित और चिड़चिड़ा हो जाता है, और उसकी इसी मानसिक स्थिति के कारण किसी न किसी से विवाद हो जाता है। इसके बावजूद, आज के अत्यधिक तनावपूर्ण, प्रतिस्पर्धी और अनिश्चितता से भरे दौर में दैनिक राशिफल का कॉलम पाठकों के लिए एक सस्ते ‘मानसिक संबल’ का काम भी करता है। जब जीवन में परिस्थितियाँ कठिन होती हैं, तो अखबार में छपी दो सकारात्मक पंक्तियाँ—“शीघ्र ही परिस्थितियों में सुधार होगा”—व्यक्ति को दिनभर के लिए उम्मीद और मानसिक ढांढस दे जाती हैं।

हालाँकि समाचार पत्र एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान होने के नाते पाठकों की इस उत्सुकता को भुनाते हैं, लेकिन यहाँ संपादकीय विवेक और मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। राशिफल के नाम पर भय और अंधविश्वास फैलाने के बजाय इसकी भाषा सकारात्मक, प्रेरणादायक और नैतिक परामर्श देने वाली होनी चाहिए, ताकि यह पाठकों को डराने के बजाय उनमें आत्मविश्वास का संचार करे। निष्कर्षतः, अखबारों में छपने वाला राशिफल न तो पूरी तरह अचूक भविष्यवक्ता है और न ही महज निरर्थक बकवास; यह संभावनाओं के गणित, भाषा की चालाकी और मानव मन की उम्मीदों का एक दिलचस्प मिश्रण है। इसे चाय की चुस्की के साथ एक हल्के-फुल्के मनोरंजन या सकारात्मक विचार के रूप में पढ़ना तो ठीक है, लेकिन अपने जीवन के फैसले, मेहनत और कर्म को छोड़कर केवल नक्षत्रों के भरोसे बैठ जाना उस वैज्ञानिक चेतना की हार होगी जिसे गढ़ने में मानव सभ्यता को सदियाँ लगी हैं। अंततः भाग्य नक्षत्रों के खानों में नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने पुरुषार्थ से तय होता है।

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