क्या आपने हाल ही में बैंक में नया खाता खुलवाया है और आपके जमा किए पैसों में से अचानक कुछ रुपये गायब हो गए? क्या आपसे बिना पूछे किसी बीमा के नाम पर रकम काट ली गई, या फिर आपको यह तक नहीं पता चला कि आपके खाते से पैसे किस चीज़ के लिए काटे गए हैं? क्या जन-कल्याण के नाम पर चलने वाली सरकारी बीमा योजनाओं के प्रीमियम भी आपकी बिना जानकारी के आपके खाते से घटा दिए गए हैं?
यदि इन सवालों का जवाब ‘हाँ’ में है, तो आप अकेले नहीं हैं। देश के तमाम शहरों और ग्रामीण अंचलों में नया बचत खाता (Savings Account) खुलवाने पहुँच रहे साधारण नागरिकों के साथ यह शिकायत लगातार सामने आ रही है। बैंक जाने पर ग्राहकों को न्यूनतम 2,000 रुपये जमा करने को कहा जाता है, लेकिन बाद में पासबुक में एंट्री करवाने या मोबाइल पर आए संदेशों से पता चलता है कि उनमें से ₹1,000 की राशि सीधे काट ली गई है। सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि खाताधारक को यह तक स्पष्ट नहीं किया जाता कि यह कटौती किस मद में हुई है—क्या यह किसी निजी कंपनी की वाणिज्यिक बीमा पॉलिसी है, या फिर ‘प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना’ (PMJJBY) व ‘प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना’ (PMSBY) जैसी किसी सरकारी सामाजिक सुरक्षा योजना का प्रीमियम। जब वित्तीय समावेशन और डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा देने की बात कही जा रही हो, तब आम नागरिक की अनभिज्ञता का लाभ उठाकर उनकी बिना स्पष्ट सहमति के पैसे काट लेना न केवल संस्थागत नैतिकता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों का भी सीधा हनन है।
इस पूरी समस्या के सूक्ष्म विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि इसके मूल में बैंक शाखाओं पर थोपे गए अत्यधिक व्यावसायिक लक्ष्यों का दबाव काम कर रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और बीमा नियामक (IRDAI) के कड़े दिशानिर्देशों के बावजूद ऐसी कार्यप्रणाली देखने को मिलती है। नियम स्पष्ट कहते हैं कि बैंक किसी भी प्राथमिक सेवा—जैसे नया खाता खोलना या लोन देना—के साथ बीमा या अन्य वित्तीय उत्पादों को ज़बरदस्ती नहीं जोड़ सकते। बैंकिंग शब्दावली में इसे ‘टाई-इन सेल्स’ या ‘फोस्र्ड बंडलिंग’ कहा जाता है, जो पूरी तरह गैर-कानूनी है। बावजूद इसके, खाता खोलने की जटिल कागज़ी कार्रवाई और ढेरों फॉर्मों के बीच ग्राहकों को बिना पूरी जानकारी दिए सहमति पत्रों पर दस्तखत ले लिए जाते हैं या सिस्टम में ‘ऑटो-डेबिट’ चालू कर दिया जाता है। यहाँ तक कि आम जनता की सुरक्षा के लिए शुरू की गई सरकारी बीमा योजनाओं को भी पारदर्शी तरीके से समझाने के बजाय केवल अपने लक्ष्य पूरे करने का जरिया बना लिया गया है। किसी भी ग्राहक के खाते से उसकी स्पष्ट और पृथक लिखित सहमति के बिना एक भी रुपया काटना बैंकिंग पारदर्शिता के सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है।
कानूनी और नियामक परिप्रेक्ष्य में देखें तो रिज़र्व बैंक के ‘कस्टमर सर्विस एंड रिस्पॉन्सिबल बिज़नेस कंडक्ट’ के नियम खाताधारकों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं। नियमों के अनुसार, बैंक में खाता खोलने के लिए बीमा लेना पूरी तरह से ऐच्छिक है और कोई भी बैंक अधिकारी इसे अनिवार्य शर्त बनाकर ग्राहक पर दबाव नहीं बना सकता। इसके अतिरिक्त, यदि किसी ग्राहक का अनचाहा बीमा कर भी दिया गया है, तो बीमा नियमों के तहत उसे 15 दिनों का ‘फ्री-लुक पीरियड’ मिलता है। इस अवधि के भीतर लिखित आवेदन देकर पॉलिसी रद्द करवाई जा सकती है और काटा गया पूरा पैसा रिफंड प्राप्त किया जा सकता है। हाल के दिनों में केंद्रीय वित्त मंत्रालय और आरबीआई दोनों ने ही बैंकों द्वारा की जा रही इस ‘मिस-सेलिंग’ पर कड़ा रुख अपनाते हुए सख्त हिदायत दी है कि बैंक अपने कोर बैंकिंग कार्यों पर ध्यान केंद्रित करें और ग्राहकों पर ज़बरन थर्ड-पार्टी उत्पाद न थोपें।
इस संस्थागत मनमानी पर रोक लगाने के लिए दोहरे स्तर पर ठोस कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है। एक ओर जहाँ बैंक प्रबंधन को अपनी शाखाओं की जवाबदेही तय करनी होगी ताकि व्यावसायिक लक्ष्यों की आड़ में अनैतिक तरीकों को बढ़ावा न मिले, वहीं दूसरी ओर नागरिकों को भी अपने अधिकारों के प्रति सतर्क होना पड़ेगा। यदि किसी ग्राहक के खाते से बिना बताए या दबाव बनाकर बीमा की राशि काटी गई है, तो चुप रहने के बजाय संबंधित शाखा प्रबंधक से लिखित शिकायत दर्ज करानी चाहिए। यदि बैंक 30 दिनों के भीतर संतोषजनक समाधान या रिफंड प्रदान नहीं करता है, तो ग्राहक सीधे आरबीआई के शिकायत प्रबंधन पोर्टल (cms.rbi.org.in) पर बैंकिंग लोकपाल (Banking Ombudsman) से ऑनलाइन शिकायत कर सकते हैं। संपूर्ण बैंकिंग व्यवस्था जनता के ‘विश्वास’ पर टिकी है, और इस विश्वास को अक्षुण्ण रखने के लिए जरूरी है कि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को पारदर्शी व स्वैच्छिक रखा जाए, न कि गुप्त और अनिवार्य।
