आधुनिकता मनुष्य की करुणा, मानवता और नैतिकता का हनन कर रही है

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आज जब हम 21वीं सदी के स्मार्ट शहरों और आधुनिक जीवनशैली का जश्न मना रहे हैं, तब विकास की इन चमचमाती सड़कों के पीछे एक ऐसी तस्वीर भी छिपी है जो हमारी सामूहिक नैतिकता को कटघरे में खड़ा करती है। कचरे के पहाड़ों पर अपना पेट भरने की कोशिश करती ये गायें केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं हैं, बल्कि यह हमारे समाज के भीतर मर चुकी संवेदनाओं का एक जीवंत प्रमाण हैं।

अक्सर राजनीतिक मंचों और सरकारी फाइलों में पशु संरक्षण और गौ-सेवा की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन जैसे ही वास्तविकता के धरातल पर नज़र डालते हैं, तो ये वादे कागज़ी ही नज़र आते हैं। चर्चाएं और घोषणाएं तो बहुत होती हैं, लेकिन ज़हरीला प्लास्टिक चबाने को मजबूर इन बेजुबानों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। आधुनिक समाज में हमारा ध्यान केवल अपनी सुविधाओं पर है, जबकि हमारे ही बीच रह रहे ये जीव व्यवस्था की अनदेखी की बलि चढ़ रहे हैं।

इस बदहाली के लिए केवल व्यवस्था ही नहीं, बल्कि वे लोग भी बराबर के जिम्मेदार हैं जो मवेशियों को पालते तो हैं, लेकिन दूध निकालने के बाद उन्हें लावारिस सड़कों पर छोड़ देते हैं। पशुपालकों में इस बुनियादी जिम्मेदारी का अभाव कि उनका मवेशी क्या खा रहा है और कहाँ है, हमारी गिरती नैतिकता को दर्शाता है। जब पशु उपयोगिता की वस्तु मात्र बनकर रह जाते हैं, तो इंसान की करुणा का अंत निश्चित है।

प्रशासनिक स्तर पर अब ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है। शहर के कचरा डंपिंग यार्ड और ट्रेंचिंग ग्राउंड ऐसे असुरक्षित खुले क्षेत्र बन गए हैं जहाँ मवेशी आसानी से पहुँच जाते हैं। इन यार्डों की उचित घेराबंदी अब कोई विकल्प नहीं बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता है। जब तक इन क्षेत्रों को सुरक्षित रूप से कवर नहीं किया जाता, तब तक बेजुबान मवेशी प्लास्टिक के घातक जाल में फंसते रहेंगे। यह कार्य न केवल प्रशासनिक कर्तव्य है, बल्कि जीव मात्र के प्रति हमारी नैतिकता का हिस्सा भी है।

अंततः, यह स्वीकार करने का समय है कि आधुनिकता का अर्थ केवल मशीनों का अपग्रेड होना नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का जीवित रहना भी है। यदि कचरे के ढेर में ज़हर निगलते जीव हमें विचलित नहीं करते, तो यह मान लेना चाहिए कि आधुनिकता ने हमारी मानवता का हनन कर दिया है। हमें अपनी स्मार्ट दुनिया में तकनीक के साथ-साथ करुणा और नैतिकता को भी वापस लाना होगा।
सभ्यता की असली पहचान ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमज़ोर और बेजुबान जीवों के प्रति कितनी संवेदनशील है।

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