कुम्हारी। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि दुश्मन से जीतना आसान है, लेकिन अपनों को संभालना मुश्किल। आज कुम्हारी नगर पालिका की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजर रही है।
जिस बदलाव की उम्मीद के साथ कुम्हारी की जनता ने भाजपा को जनादेश दिया था, वह उम्मीद अब पार्टी के भीतर पनप रहे मनमुटाव और गुटबाजी की भेंट चढ़ती नजर आ रही है।
कुम्हारी में भाजपा को सत्ता की बागडोर संभाले एक वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। कायदे से यह समय विकास की योजनाओं को जमीन पर उतारने और जनता के भरोसे को मजबूत करने का होना चाहिए था।
लेकिन विडंबना देखिए, जमीनी विकास की चर्चा कम और पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा ज्यादा हो रही है। नगर पालिका प्रशासन और संगठन के शीर्ष पदों पर बैठे नेतृत्व के खिलाफ अब पार्टी के अंदर से ही विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं।
सूत्रों के हवाले से तो सत्ता में आने के मात्र 3-4 महीनों के भीतर ही इस आपसी जंग की खबरें मिल रही थीं, लेकिन अब यह खींचतान सड़कों और सोशल मीडिया पर साफ नजर आने लगी है।
आज नगर में भाजपा के ही पार्षदों को यह कहते सुना जा रहा है कि हमारा चल ही नहीं रहा है, हम स्वयं परेशान हैं। जब चुने हुए जनप्रतिनिधि ही अपनी सरकार में असहाय महसूस करने लगें, तो संगठन की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सिर्फ पार्षद ही नहीं, पार्टी कार्यकर्ताओं का भी गंभीर आरोप है कि चुनाव के वक्त हमने पसीना बहाकर भाजपा को सत्ता में लाने में मदद की, और जब सत्ता मिल गई तो हमारा ही कोई पूछने वाला नहीं है।
कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर भारी रोष है कि जनता से जिन मुद्दों पर वोट मांगा था, उन्हें पूरा नहीं कर पा रहे हैं। हालत यह है कि अब कार्यकर्ताओं को जनता के बीच जाने में भी शर्म महसूस हो रही है।
जब कांग्रेस सत्ता में थी, तो उन्होंने भी यही गलती की थी—कार्यकर्ताओं की अनदेखी और आंतरिक खींचतान। भाजपा सत्ता में तो आई, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने कांग्रेस की उन गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा।
हर परिवार या संगठन में वैचारिक नाराजगी थोड़ी-बहुत होती है, लेकिन जब यह चीज सड़कों पर या सोशल मीडिया पर बाहर आने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि संगठन की स्थिति सही नहीं है।
कुम्हारी में भाजपा सत्ता में आई है, लेकिन संगठन के भीतर की यह खामी और मनमुटाव पार्टी की साख को नुकसान पहुँचा रहा है। भाजपा नेतृत्व को यह समझना होगा कि सत्ता सेवा का माध्यम है।
यदि समय रहते पार्षदों की बेबसी और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर नहीं की गई, तो जनता का भरोसा टूटने में देर नहीं लगेगी। क्या कुम्हारी भाजपा इस बिखराव को रोक पाएगी, या फिर पुराने इतिहास को दोहराएगी?
कुम्हारी की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों तक इसे जरूर पहुँचाएं और अपनी प्रतिक्रिया देना न भूलें।
