हममें से लगभग हर इंसान ने अपने विद्यार्थी जीवन में वह दौर देखा है। स्कूल का पीरियड खत्म होता था, अचानक एक अंकल हाथ में रंग-बिरंगे कागज, जादुई पेन, चक्र वाली स्पायोग्राफ स्केच किट, 3D एनीमेशन वाली तस्वीरें या पेपर-आर्ट की गाइड बुक लेकर क्लासरूम में दाखिल होते थे। वे बोर्ड पर कुछ सेकंड में उड़ती हुई चिड़िया बना देते थे या एक काली पट्टी खिसकाकर किसी कार्टून को चलता हुआ दिखा देते थे।
बच्चे कौतूहल से आँखें फाड़े देखते रह जाते थे। उस एक घड़ी में मासूम मन में यह बात बैठ जाती थी कि अगर मेरे पास यह ₹30-50 का सामान नहीं हुआ, तो मैं पीछे छूट जाऊँगा।
घर लौटकर माँ-बाप के सामने वह बाल-हठ, रोना-धोना और ज़िद करना—आज भले ही पुरानी यादों का हिस्सा लगे या एक निर्दोष बचपन का अनुभव दिखे, लेकिन जब आज एक अभिभावक या जिम्मेदार नागरिक के तौर पर इसे देखते हैं, तो एक बड़ा और कड़वा सवाल सामने खड़ा होता है कि ज्ञान के मंदिर को किसी के फायदे के लिए हाट-बाज़ार बनाने की इजाज़त दी किसने?
अगर इस कारोबार में लगे वेंडरों या कंपनियों का पक्ष देखा जाए, तो उनका बड़ा सीधा तर्क होता है कि हम तो केवल बच्चों को आर्ट, क्राफ्ट और साइंस के छोटे प्रयोग सिखाने आते हैं। हम किसी पर खरीदने का दबाव नहीं बनाते। जो बच्चा रुचि रखता है और जिसके अभिभावक दिलाना चाहते हैं, वही लेता है।
सुनने में यह बात बहुत जायज लगती है। लेकिन इसके पीछे छिपी मनोवैज्ञानिक चालाकी को समझना ज़रूरी है। 7 से 12 साल के बच्चे यह फैसला लेने में सक्षम नहीं होते कि कौन सी चीज़ उनके लिए ज़रूरी है और कौन सी महज एक पल का आकर्षण।
जब क्लास के 5 बच्चे वह स्पायोग्राफ या 3D मैजिक बुक खरीद लेते हैं, तो बाकी 35 बच्चों में हीनभावना या वंचित रहने का डर पैदा हो जाता है।
वर्कशॉप तो केवल एक प्रवेश द्वार होता है, असली मकसद कक्षा के 30-40 मिनट का इस्तेमाल उत्पाद बेचने के लिए सेल्स डेमो की तरह करना होता है।
कानूनी और प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो किसी भी शासकीय या अनुदान प्राप्त विद्यालय परिसर के भीतर नकद लेनदेन करके किसी भी प्रकार की व्यावसायिक वस्तु बेचने पर सख्त मनाही होती है।
बिना जिला शिक्षा अधिकारी या उच्च स्तर की लिखित अनुमति के किसी भी अज्ञात बाहरी व्यक्ति को कक्षा के भीतर विद्यार्थियों के बीच जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
शाला विकास एवं प्रबंधन समिति के नियमों में भी स्पष्ट होता है कि स्कूल की संपत्ति और समय का उपयोग केवल पाठ्यक्रम और स्वीकृत सह-शैक्षणिक गतिविधियों के लिए होगा।
फिर सवाल उठता है कि जब नियम इतने सख्त हैं, तो स्पायोग्राफ किट, ओरिगामी बुक्स, 3D कार्ड और फैंसी पेन बेचने वाले लोग सीधे बच्चों के बेंच तक कैसे पहुँच रहे हैं?
बिना आदेश के यदि कोई बाहरी वेंडर स्कूल के मुख्य गेट को पार करके क्लासरूम तक पहुँच रहा है, तो इसके पीछे दो ही बातें हो सकती हैं या तो घोर प्रशासनिक लापरवाही, या फिर कमीशन का खेल।
कई बार वेंडर किसी अधिकारी की पुरानी प्रशंसा पत्र वाली पर्ची दिखाकर प्रवेश करते हैं, तो कई मामलों में स्थानीय स्तर पर स्कूल प्रशासन या प्रधानाध्यापक को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष लाभ दिया जाता है।
इन ₹20 से ₹50 वाले सामानों की वास्तविक निर्माण लागत मात्र ₹2 से ₹5 होती है। इस भारी मुनाफे का एक हिस्सा स्कूल परिसर में प्रवेश पाने के लिए बांँटा जाता है—चाहे वह स्कूल विकास फंड का अनौपचारिक दान हो या किसी की निजी जेब में जाने वाला कमीशन।
एक प्रधानाध्यापक जो स्कूल की अनुशासन व्यवस्था का रक्षक है, वही अगर किसी सेल्समैन को बच्चों का कीमती पढ़ाई का समय बेचने के लिए दे रहा है, तो यह पद का सीधा दुरुपयोग है।
यदि कंपनियों, वेंडरों या स्कूल प्रशासन का वाकई यह मानना है कि इन कागज़ी कलाकृतियों, स्पायोग्राफ चक्रों और 3D किताबों से बच्चों का बौद्धिक और रचनात्मक विकास होता है—तो फिर बच्चों से पैसे क्यों वसूले जाते हैं?
अगर यह शिक्षा का अंग है, तो इसे स्कूल के क्राफ्ट/आर्ट बजट या शासन की सर्व शिक्षा सामग्री का हिस्सा होना चाहिए। हर बच्चे को यह मुफ़्त मिलना चाहिए ताकि अमीर और गरीब का भेद मिटे।
अगर कोई संस्था वाकई रचनात्मकता बाँटना चाहती है, तो वह केवल तकनीक सिखाए, सामग्री का डेमो दे और चली जाए। क्लासरूम के अंदर कैश काउंटर खोलना सीधे तौर पर व्यावसायिक शोषण है।
बचपन की यादें मासूम होनी चाहिए, किसी कंपनी के टार्गेट और किसी स्कूल प्रमुख के कमीशन का शिकार नहीं। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ज़्यादातर बच्चे सामान्य या गरीब आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं। जब एक वेंडर क्लास में आकर्षक खिलौने नुमा सामान दिखाता है, तो वह केवल सामान नहीं बेचता, बल्कि कई घरों में शाम के वक्त आर्थिक तनाव और बच्चे की ज़िद की वजह बनता है।
शिक्षा विभाग को इस मामले में केवल कागज पर सर्कुलर जारी करके हाथ नहीं खींच लेना चाहिए, बल्कि ऐसे वेंडरों को पनाह देने वाले शाला प्रमुखों पर सीधी अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए। स्कूल को पढ़ाई की जगह ही रहने दिया जाए, इसे किसी प्राइवेट कंपनी का प्रमोशनल वेन्यू न बनाया जाए।
By Shailendra Sahu
