पुरी रथ यात्रा: सोने की झाड़ू से लेकर 15 दिन के एकांतवास तक… पढ़िए हर पहलू की पूरी रिपोर्ट!

हमारे WhatsApp Group से जुड़ें 👉 Join Now

विश्व प्रसिद्ध महाप्रभु श्री जगन्नाथ की पावन रथ यात्रा आस्था, संस्कृति और जन-आंदोलन का एक ऐसा महासंगम है, जिसे देखने के लिए पूरी दुनिया से लाखों श्रद्धालु ओडिशा के तटीय शहर पुरी में उमड़ते हैं। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित होने वाला यह रथोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जाति, धर्म और वर्ग की सीमाओं को तोड़कर मानवता और समता का संदेश देने वाला महापर्व है।

1. रथ यात्रा का इतिहास: कब से शुरू हुई यह परंपरा?

पुरी की रथ यात्रा को विश्व के सबसे प्राचीन और निरंतर चलने वाले धार्मिक आयोजनों में से एक माना जाता है। इसके शुरुआत के प्रमाण इतिहास और पुराणों दोनों में गहराई से मिलते हैं:

  • पौराणिक एवं शास्त्रीय काल (Time Immemorial): सनातन परंपरा के अनुसार, यह यात्रा सतयुग से चली आ रही है। इसका विस्तृत उल्लेख स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण और कपिला संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत खुद मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने की थी, जिन्होंने मूल मंदिर और विग्रहों का निर्माण करवाया था।
  • ऐतिहासिक और प्रामाणिक काल (12वीं सदी): आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार, वर्तमान भव्य स्वरूप में इस यात्रा का दस्तावेजी इतिहास 12वीं शताब्दी (लगभग 800+ वर्ष पुराना) माना जाता है। गंगा राजवंश के प्रतापी राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने जब 12वीं सदी में पुरी के वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया, तब से इस रथोत्सव को राजकीय संरक्षण मिला और इसका भव्य आयोजन अनिवार्य रूप से हर साल होने लगा।
  • विदेशी यात्रियों के दस्तावेज: भारत आने वाले कई ऐतिहासिक यात्रियों ने भी इस यात्रा की प्राचीनता को दर्ज किया है। चौथी शताब्दी (400 CE) में चीनी यात्री फाह्यान ने भारत में रथ उत्सवों का वर्णन किया था। वहीं, 13वीं शताब्दी से यूरोपीय यात्रियों और ईसाई मिशनरियों (जैसे ओडोरिक ऑफ पोर्डेनोने) के लेखों में पुरी की इस विशाल रथ यात्रा और उसमें उमड़ने वाले लाखों लोगों का लिखित ब्यौरा मिलता है।
  • वैश्विक विस्तार (1967 से): भारत से बाहर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहली बार रथ यात्रा की शुरुआत साल 1967 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर में इस्कॉन (ISKCON) के संस्थापक श्रील प्रभुपाद जी के प्रयासों से हुई थी। आज यह वैश्विक स्तर पर मनाई जाती है।

2. पौराणिक पृष्ठभूमि: क्यों निकलती है रथ यात्रा?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ (ब्रह्मांड के स्वामी), उनके बड़े भाई बलभद्र और छोटी बहन देवी सुभद्रा की अपनी मौसी (गुंडिचा माता) के घर की वार्षिक यात्रा का प्रतीक है। एक मान्यता यह भी है कि इस दिन भगवान द्वारका से अपनी प्रिय भूमि वृंदावन लौटे थे।

पुरी रथ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘समावेशी’ (Inclusive) स्वरूप है। साल भर जो श्रद्धालु या विदेशी नागरिक मुख्य मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाते, महाप्रभु खुद मंदिर से बाहर निकलकर राजमार्ग (बड़ा डांड) पर आते हैं ताकि हर कोई उनके ‘दर्शन’ कर सके। मान्यता है कि रथ के रस्सों को छूने या रथ पर विराजमान प्रभु के दर्शन मात्र से जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है।

3. तीन भव्य रथ: इंजीनियरिंग और अध्यात्म का अनूठा मेल

रथ यात्रा के लिए हर साल नए रथों का निर्माण पारंपरिक रूप से ‘अक्षय तृतीया’ से शुरू होता है। इनमें लोहे की कीलों या आधुनिक मशीनों का प्रयोग नहीं होता; केवल लकड़ी की पारंपरिक जोड़-तोड़ (Wood-joinery) से इन्हें खड़ा किया जाता है。

तीनों भाई-बहनों के रथों का रंग, आकार और पहियों की संख्या भिन्न होती है:

रथ का नामदेवतापहियों की संख्याऊंचाईरंग संयोजन
नंदीघोष (Nandighosa)भगवान जगन्नाथ16 पहिएलगभग 45 फीटलाल और पीला
तालध्वज (Taladhwaja)भगवान बलभद्र14 पहिएलगभग 44 फीटलाल और हरा/नीला
दर्पदलन / देवदलनदेवी सुभद्रा12 पहिएलगभग 43 फीटलाल और काला

4. मुख्य रस्में और अनुष्ठान (Step-by-Step)

रथ यात्रा का उत्सव कई हफ्तों तक चलता है और इसकी हर एक रस्म सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार निभाई जाती है:

1.स्नान पूर्णिमा (Sacred Bath):यात्रा से 15 दिन पहले.

ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन तीनों मूर्तियों को मंदिर के स्नान वेदी पर लाया जाता है और 108 घड़ों के पवित्र सुगंधित जल से स्नान कराया जाता है।

2.अनासरा काल (Sacred Seclusion):15 दिनों की अवधि.

अत्यधिक स्नान के कारण भगवान ‘बीमार’ हो जाते हैं और 15 दिनों के लिए एकांतवास (अनासरा) में चले जाते हैं। इस दौरान भक्तों के लिए दर्शन बंद रहते हैं।

3.नवयौवन दर्शन और नेत्रोत्सव:यात्रा से एक दिन पहले.

स्वस्थ होने के बाद भगवान नए रूप में दर्शन देते हैं, जिसे ‘नवयौवन दर्शन’ या ‘नेत्रोत्सव’ कहा जाता है।

4.पहांडी महोत्सव (Pahandi):रथ यात्रा का दिन.

देवताओं को गर्भगृह से अत्यंत भव्य तरीके से, झूलते और थिरकते हुए मुख्य मंदिर से बाहर लाकर उनके संबंधित रथों पर विराजमान किया जाता है।

5.छेरा पहांरा (Chhera Pahanra):समता का सबसे बड़ा संदेश.

जब भगवान रथों पर बैठ जाते हैं, तब पुरी के गजपति राजा (शाही वंशज) पालकी में आते हैं और सोने की झाड़ू से रथों के चबूतरे को साफ करते हैं। यह दर्शाता है कि भगवान के सामने राजा और रंक सब समान हैं。

6.रथ खींचना (Chariot Pulling):महाउत्सव की शुरुआत.

शंखनाद, ढोल-नगाड़ों और ‘जय जगन्नाथ’ के नारों के बीच लाखों श्रद्धालु मोटे रस्सों की मदद से रथों को खींचना शुरू करते हैं।

5. गुंडिचा मंदिर प्रवास और वापसी (बहुड़ा यात्रा)

मुख्य मंदिर से खींचकर इन रथों को करीब 3 किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर (मौसी के घर) ले जाया जाता है। वहां भगवान 7 दिनों तक विश्राम करते हैं। इसके बाद आषाढ़ शुक्ल दशमी को भगवान वापस मुख्य मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं, जिसे ‘बहुड़ा यात्रा’ (Bahuda Yatra) कहा जाता है।

सुना बेष (Suna Besha) और नीलाद्रि बिजे

  • सुना बेष: वापसी के बाद एकादशी के दिन तीनों देवताओं को रथों पर ही करोड़ों रुपये के सोने के आभूषणों से सजाया जाता है, जिसे ‘सुना बेष’ (स्वर्ण रूप) कहते हैं।
  • नीलाद्रि बिजे: इसके बाद भगवान को वापस गर्भगृह में स्थापित किया जाता है। अंदर जाते समय भगवान जगन्नाथ रूठी हुई माता लक्ष्मी को मनाने के लिए ‘रसगुल्ला’ खिलाते हैं, जो इस भव्य उत्सव का अंतिम और बेहद मीठा अनुष्ठान होता है।

एक अनोखी मिसाल – भक्त सालबेग की कथा: रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ ‘मजार’ (एक मुस्लिम भक्त सालबेग की समाधि) पर कुछ देर के लिए जरूर रुकता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और यह साबित करती है कि ईश्वरीय भक्ति में कोई धार्मिक भेदभाव नहीं होता।

पुरी की यह रथ यात्रा केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं, बल्कि सामूहिक ऊर्जा, सहिष्णुता और अटूट आस्था का प्रतीक है, जो हर साल भारतीय संस्कृति की भव्यता को वैश्विक पटल पर रेखांकित करता है।

error: Content is protected !!