अंत भला तो सब भला

वो खिलौना आजतलक नहीं मिला है,जिसका ख़्वाब देखता था, बचपन में।उसकी याद अब भी ताजी है,रोते–रोते कटे हैं दिन, बचपन में।मुझे अपनी रफ्तार याद है,वो भी क्या दिन थे जवानी के।धीमा चलना मेरी मजबूरी है,अब नहीं रहा वो दिन जवानी के।अब याद कुछ नहीं आ रहा है,लगता है ये दिन हैं बुढ़ापे के।हमराह जो थे, … Read more

जीत बेशक होगी

सफलता के दरवाजे बंद है जंग लगे तालों से, ये खुलते है हमारे हुनर, दृढ़निश्चय प्रयासों से। लाख दूर नजर आते है तट बीच समंदर से, आत्मविश्वास हमें थकने नहीं देती परिश्रम से। कई गंभीर अंदरूनी जख्म होंगे असफलता से, जीत लक्ष्य जिनके, पाँव नहीं डगमगाते जंग से। मंजिल के रास्तों में बचना साजिश करता … Read more

चाटुकारिता और बिकती वफादारी

लहजा बदलेगा उनका भी परिवर्तन के बाद चाटुकार अपना बाप बदले रहते है। कर देंगे अनाथ अपने बाप को, ये दोगले किसी के संगे नहीं होते है। दिनरात गुणगान गाने वाले अपने बाप के लिए जहर उगलेंगे, दूसरे के तलवे चाटकर ये अपनी वफादारी साबित करेंगे। जनता को धोखा देकर नए बाप को साधु–सज्जन कहेंगे, … Read more

ठंडक का हिसाब

बदला है मौसम, यह पहला एहसास ठंडक का; न जाने कितनों को खाट पकड़ाएगी। जुबा से निकलेगी मां, और फटे जेबों से दवाइयों पर खर्च करवाएगी। बदला है मौसम तो कुछ तो असर दिखाएगी ही, रोकर काटो या हंसकर, ये मौसम कुछ दिनों में फिर बदल जाएगी। ✍️शैलेन्द्र साहू

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