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वो खिलौना आजतलक नहीं मिला है,
जिसका ख़्वाब देखता था, बचपन में।
उसकी याद अब भी ताजी है,
रोते–रोते कटे हैं दिन, बचपन में।
मुझे अपनी रफ्तार याद है,
वो भी क्या दिन थे जवानी के।
धीमा चलना मेरी मजबूरी है,
अब नहीं रहा वो दिन जवानी के।
अब याद कुछ नहीं आ रहा है,
लगता है ये दिन हैं बुढ़ापे के।
हमराह जो थे, वो सब चले गए हैं,
लगता है मिल गई निजात बुढ़ापे से।
✍️ शैलेन्द्र साहू