जीत बेशक होगी

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सफलता के दरवाजे बंद है जंग लगे तालों से,

ये खुलते है हमारे हुनर, दृढ़निश्चय प्रयासों से।

लाख दूर नजर आते है तट बीच समंदर से,

आत्मविश्वास हमें थकने नहीं देती परिश्रम से।

कई गंभीर अंदरूनी जख्म होंगे असफलता से,

जीत लक्ष्य जिनके, पाँव नहीं डगमगाते जंग से।

मंजिल के रास्तों में बचना साजिश करता लोगों से,

जीत बेशक होगी डरना नहीं इन छोटे कंकड़ों से।

✍️ शैलेन्द्र साहू

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